कहानी का समय
*रसोई की दो रानियाँ*
*_सुमन की शादी को अभी बीस दिन ही हुए थे।_*
*_विदाई के वक्त उसकी माँ ने समझाया था, "बेटी, ससुराल में अपनी जगह बनानी है तो काम से जी मत चुराना। सास को पूरा आराम देना।" सुमन ने माँ की यह सीख गांठ बांध ली थी।_*
*_सुबह के छह बजते ही सुमन बिस्तर छोड़ देती।_* *_नहा-धोकर, पूजा करके सीधे रसोई में मोर्चा संभाल लेती। उसकी सास, मनोरमा जी, जो पिछले पैंतीस सालों से इस घर की धुरी थीं, जब सुबह सात बजे अपनी आदत के मुताबिक रसोई की ओर बढ़तीं, तो देखतीं कि चाय की केतली से भाप निकल रही है, नाश्ते की तैयारी पूरी है और रोटियों के लिए आटा लग चुका है।_*
*_शुरुआत के दो-चार दिन तो मनोरमा जी को बहुत अच्छा लगा। पड़ोसियों से कहती फिरीं, "मेरी बहू तो हीरा है, मुझे तो रसोई में पैर ही नहीं रखने देती। कहती है—माँ जी, अब आपकी उम्र आराम करने की है।"_*
*_लेकिन जैसे- जैसे दिन बीतते गए, वह 'आराम' मनोरमा जी को काटने लगा।_*
*_आज रविवार था। घर में सबके लिए छोले-भटूरे बनने थे। मनोरमा जी को छोले बनाने का बहुत शौक था। उनके हाथ के 'अमृतसरी छोले' पूरे खानदान में मशहूर थे। वह बड़े उत्साह से रसोई की तरफ बढ़ीं। उन्होंने सोचा कि आज बहू को सिखाएंगी कि मसालों का सही अनुपात क्या होता है।_*
*_जैसे ही वह रसोई के दरवाजे पर पहुंचीं, उनके कदम ठिठक गए।_*
*_सुमन पहले से वहां मौजूद थी। कड़ाही में तेल गर्म हो रहा था और छोले उबल चुके थे। खुशबू बता रही थी कि तड़का लग चुका है।_*
*_"अरे बहू," मनोरमा जी ने फीकी मुस्कान के साथ कहा, "तूने छोले बना भी दिए? मैं सोच रही थी कि आज मैं बनाती। सबको मेरे हाथ का स्वाद पसंद है।"_*
*_सुमन ने मुस्कुराते हुए, बिना रुके भटूरे बेलते हुए कहा, "माँ जी, आप क्यों तकलीफ करती हैं? मैंने यूट्यूब पर आपकी रेसिपी देख ली थी, कोशिश की है वैसा ही बनाने की। आप बस डाइनिंग टेबल पर बैठिए, मैं_*
*_गरमा-गरम लाती हूँ।"_*
*_मनोरमा जी चुपचाप वहां से हट गईं। वह जाकर अपने कमरे में खिड़की के पास बैठ गईं। बाहर का मौसम सुहाना था, लेकिन उनके अंदर एक अजीब सा तूफ़ान चल रहा था।_*
*_उन्हें लगा जैसे उनके हाथों से सिर्फ़ करछुल नहीं छीनी गई है, बल्कि इस घर पर उनकी 'सत्ता' छीन ली गई है। पिछले पैंतीस सालों से, रसोई उनका साम्राज्य था। कौन क्या खाएगा, कब खाएगा, यह सब वह तय करती थीं। इसी बहाने बेटे-पति उनसे जुड़े रहते थे। "माँ, नमक कम है," या "माँ, आज वो बना दो"—ये संवाद ही तो उनकी अहमियत का सुबूत थे।_*
*_लेकिन अब?_*
*_नाश्ते की मेज पर सबने सुमन के छोलों की तारीफ की।_*
*_"वाह सुमन! मज़ा आ गया," पति ने कहा।_*
*_"बिल्कुल माँ के हाथ जैसा स्वाद है," ससुर जी ने भी हामी भरी।_*
*_मनोरमा जी चुपचाप खाती रहीं। किसी ने नोटिस नहीं किया कि उनकी थाली में भटूरा वैसे का वैसा रखा था। उन्हें लग रहा था कि वह धीरे-धीरे इस घर के लिए 'अदृश्य' होती जा रही हैं। अगर काम नहीं, तो उनकी ज़रूरत क्या है? क्या वह सिर्फ़ एक पुरानी कुर्सी की तरह घर के कोने में पड़ी रहने के लिए हैं?_*
*_दोपहर को सुमन जब काम निपटाकर अपने कमरे में आराम करने गई, तो उसे प्यास लगी। वह पानी लेने रसोई में आई। वहां का नज़ारा देख वह हैरान रह गई।_*
*_मनोरमा जी रसोई के स्लैब के पास खड़ी थीं। वह मसालों के डिब्बे (मसालेदानी) को खोलकर एक-एक कटोरी को छू रही थीं। हल्दी, जीरा, धनिया... जैसे कोई माँ अपने बच्चों को सहला रही हो। उनकी आँखों से आंसू टपक रहे थे और मसालों के डिब्बे में गिर रहे थे।_*
*_सुमन दरवाज़े पर ही जम गई। उसे अपनी माँ की कही बात याद आई—"सास को आराम देना।" लेकिन उसे यह नहीं बताया गया था कि एक गृहिणी के लिए उसका काम सिर्फ़ 'काम' नहीं, उसकी 'पहचान' होता है। उसे छीन लेना, उसकी पहचान को मिटा देने जैसा है।_*
*_सुमन दबे पाँव वापस मुड़ी। वह अपने कमरे में गई और कुछ देर सोचती रही। उसे अपनी गलती का अहसास हो चुका था। वह 'आदर्श बहू' बनने की होड़ में यह भूल गई थी कि मनोरमा जी अभी 'रिटायर' होने के लिए तैयार नहीं हैं।_*
*_शाम की चाय का वक्त हुआ।_*
*_रोज की तरह सुमन ने चाय नहीं बनाई। वह अपने कमरे में बैठी रही। साढ़े पांच बज गए। बाहर ससुर जी की आवाज़ आई, "अरे भाई, आज चाय मिलेगी या नहीं?"_*
*_मनोरमा जी ने घड़ी देखी। बहू अभी तक नहीं उठी? कहीं तबीयत तो खराब नहीं?_*
*_वह चिंतित होकर सुमन के कमरे में गईं। "सुमन? बेटा, तबीयत ठीक है?"_*
*_सुमन बिस्तर पर लेटी मोबाइल देख रही थी। उसने उठकर कहा, "हाँ माँ जी, सब ठीक है। बस... आज मेरा चाय बनाने का बिल्कुल मन नहीं है। क्या आप बना देंगी? और हां, वो अदरक वाली। मेरे हाथ से वो स्वाद ही नहीं आता जो आपके हाथ में है। सुबह छोले भी फीके ही लगे मुझे तो।"_*