📕 | मुझे फ़ख़्र है कि मैं इन बुज़ुर्गों की औलाद में से हूँ: “सफ़ीर-ए-नूर” सीरीज़-7
शहीद इमाम सय्यद अली ख़ामेनई (र) की दास्तान; ख़ुद आपकी ज़बानी:
* हमारे अजदाद सदियों तक ईरान के मरकज़ी इलाक़े में ज़िंदगी गुज़ारते रहे; जैसे हज़रत इमामज़ादा हज़रत सुल्तान सय्यद मुहम्मद, जिनके बारे में रिवायत है कि वो शहर-ए-तफ़रश में दफ़्न हैं। वो सादात-ए-हुसैनी के उस सिलसिले के मूरिस-ए-आला हैं जो तफ़रश, आश्तियान, फ़राहान और इस पूरे ख़ित्ते में फैला हुआ है। हज़रत सुल्तान सय्यद मुहम्मद, सुल्तान सय्यद अहमद के वालिद हैं जो हज़ावह में दफ़्न हैं, और ये बुज़ुर्ग चार वास्तों से इमाम सज्जाद (अ) तक पहुँचते हैं। सुल्तान सय्यद मुहम्मद के वालिद सय्यद हसन, उनके वालिद सय्यद हुसैन, और उनके वालिद हसन अफ़तस थे। हसन अफ़तस, अली अल-असग़र की औलाद में थे, और वो हज़रत इमाम ज़ैनुल आबिदीन (अ) के ग्यारहवें फ़र्ज़ंद थे। अली अल-असग़र; इमाम ज़ैनुल आबिदीन (अ) के सबसे फ़ाज़िल बेटों में से एक थे।
* सुल्तान सय्यद अहमद, उनके वालिद, और ग़ालिबन उनके दादा, जब अब्बासी हुक्मरानों के ज़ुल्म-ओ-सितम के बाइस अहल-ए-बैत (अ) और विलायत के चाहने वालों के ईरान के शहरों की तरफ़ आने पर मजबूर हुए, तो ईरान का मरकज़ी हिस्सा उनकी पनाहगाहों में से एक था। ये बुज़ुर्ग यहाँ आते थे और इन इलाक़ों के लोग अपनी मुहब्बत, मारिफ़त, बुलंद-नज़री और शुजाअत के साथ ख़ानदान-ए-पैग़म्बर (स) के इन अज़ीज़ फ़र्ज़ंदों को अपने दरमियान जगह देते थे। यहाँ तक कि वक़्त गुज़रने के साथ अब्बासी कारिंदों ने उन्हें ढूँढ लिया और जहाँ भी वो थे, उन पर हमला किया और उन्हें शहीद कर दिया; जैसे सुल्तान सय्यद अहमद, जो हक़ की हिमायत, ज़ुल्म-ओ-तुग़यान और फ़साद के ख़िलाफ़ जद्दोजहद के जुर्म में शहीद हुए और हज़ावह में दफ़्न हुए। अगर इन इलाक़ों के लोग रसूलुल्लाह (स) की औलाद को खुले दिल से पनाह न देते, तो उनके बच्चे अपने वालिदैन की शहादत के बाद वहाँ से चले जाते, मगर वो वहीं रहे।
* मुझे फ़ख़्र है कि मैं इन बुज़ुर्गों की औलाद में से हूँ। सय्यद अहमद की नस्ल से लेकर जनाब सय्यद क़ुत्बुद्दीन तक, सादात-ए-हुसैनी का एक मुसलसल सिलसिला है, और सब इस इलाक़े के बुज़ुर्ग अफ़राद में शुमार होते हैं। सय्यद क़ुत्बुद्दीन के बाद ये दो शाख़ों में तक़्सीम होते हैं: एक सय्यद ज़हीरुद्दीन और सय्यद फ़ख़रुद्दीन, जो मीर फ़ख़रा के नाम से मारूफ़ हैं, और यही हमारा सिलसिला है; दूसरी शाख़ क़ायम मक़ाम फ़राहानी ख़ानदान की है, जो भी बड़े अफ़राद थे, यहाँ तक कि मिर्ज़ा ईसा और फिर मिर्ज़ा अबुलक़ासिम फ़राहानी तक पहुँचती है।
* ये लोग ज़्यादा तर अहल-ए-सियासत थे, जबकि वो ज़्यादा तर इल्म-ओ-दियानत वाले थे। हमारे अजदाद में सय्यद फ़ख़रुद्दीन हुसैनी जैसी अज़ीम शख़्सियत थीं और लोगों की अक़ीदत का मरकज़ थीं। सय्यद फ़ख़रुद्दीन के पोते मरहूम सय्यद मुहम्मद तक़ी थे, और सय्यद मुहम्मद तक़ी के एक नौजवान फ़र्ज़ंद सय्यद मुहम्मद थे, जो तफ़रश से रवाना हुए और आज़रबाईजान की तरफ़ गए। जब वो ख़ामनह पहुँचे, तो ख़ामनह के लोगों ने इस रशीद सय्यद को रोक लिया और वहाँ क़ियाम के लिए ख़ूब ख़ातिर-ओ-तवज्जोह की, और वहीं से ये सिलसिला ख़ामनहई कहलाया जो बाद में ख़ामेनई कहलाया।
- हमारा शजरा-ए-नसब कुछ यूं है:
सय्यद अली ख़ामेनई बिन सय्यद जवाद ख़ामेनई बिन सय्यद हुसैन बिन सय्यद मुहम्मद बिन सय्यद मुहम्मद तक़ी बिन सय्यद मिर्ज़ा अली अकबर बिन फ़ख़रुद्दीन बिन ज़हीरूद्दीन बिन क़ुतुबुद्दीन बिन रुहुल्लाह बिन रज़ा बिन जलाल बिन सय्यद बायज़िद बिन बाबा हाशिम बिन हसन बिन हुसैन बिन महमूद बिन नज्मुद्दीन बिन मजीदुद्दिन बिन फ़त्हउल्लाह बिन रुहुल्लाह बिन नेकुद्दिन मुहम्मद बिन अब्दुल्लाह बिन मुहम्मद बिन अब्दुलमजीद बिन शरीफ़दुद्दिन बिन अब्दुल फ़त्ताह बिन मीर अली बिन अली बिन बिन अली बिन अब्बास बिन अहमद बिन मुहम्मद मुर्तज़ा बिन अहमद बिन हसन अल-अफ़्तस बिन हुसैन बिन इमामज़ादा हसन बिन इमामज़ादा अली अल असग़र बिन इमाम ज़ैनुल आबेदीन अलैहिस्सलाम।
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