निबंध " मुझे सीखना अच्छा लगता है, पर सिखाए जाने से चिढ़ है"
आधुनिक शिक्षा प्रणाली में एक विरोधाभास स्पष्ट दिखता है। एक ओर व्यक्ति ज्ञान प्राप्त करने की लालसा रखता है, वहीं दूसरी ओर उसे औपचारिक शिक्षा या सिखाने की प्रक्रिया बोझिल लगती है। "मुझे सीखना अच्छा लगता है, पर सिखाए जाने से चिढ़ है" – यह कथन स्वतंत्र चिंतन की महत्वाकांक्षा को दर्शाता है। प्राचीन काल से ही मानव स्वाभाविक जिज्ञासु रहा है। बच्चा खेल-खेल में दुनिया को समझता है, बिना किसी औपचारिक शिक्षक के। लेकिन जब स्कूल-कॉलेज की घंटी बजती है और पाठ्यक्रम थोप दिया जाता है, तो उत्साह ठंडा पड़ जाता है।
शिक्षा का उद्देश्य ज्ञानार्जन है, न कि अनुशासन थोपना। स्व-सीखने की प्रक्रिया ही सच्ची प्रगति का आधार है।
मानव मस्तिष्क जन्मजात जिज्ञासु होता है। इतिहास में बहुत उदाहरण हमें देखने के लिए मिलता हैं कि महान आविष्कारक स्वयं सीखकर आगे बढ़े। थॉमस एडिसन ने बल्ब का आविष्कार बिना किसी औपचारिक डिग्री के किया। वे कहते थे, "मैं असफलताओं से सीखा।" भारत में स्वामी विवेकानंद ने कहा, "उठो, जागो और तब तक मत रुको जब तक लक्ष्य प्राप्त न हो जाए।" वे गुरुकुल प्रणाली के समर्थक थे, जहां शिष्य स्वयं गुरु से प्रश्न करता था, न कि गुरु थोपता था।
आज के युग में इंटरनेट ने स्व-सीखने को आसान बना दिया है। यूट्यूब जैसे प्लेटफॉर्म पर कोई भी विषय स्वतंत्र रूप से सीख सकता है। लेकिन पारंपरिक कक्षा में सिलेबस बंधा होता है। शिक्षक एक ही गति से सबको पढ़ाते हैं, जिससे तेज़ दिमाग वाले ऊब जाते हैं और मंद बुद्धि वाले पिछड़ जाते हैं। एक सर्वे के अनुसार, 70 प्रतिशत छात्र कक्षा में ऊब महसूस करते हैं। स्व-सीखना रचनात्मकता बढ़ाता है, जबकि सिखाया जाना रटाते है।
उदाहरणस्वरूप, गांधीजी ने अपनी आत्मकथा में लिखा कि वे स्कूल के पाठ्यक्रम से ऊबे थे और स्वयं पुस्तकों से सीखा।
सिखाए जाने की सीमाएं और समस्याएं
सिखाए जाने की प्रक्रिया अक्सर यांत्रिक हो जाती है। शिक्षक पाठ्यपुस्तक का पाठ कराते हैं, परीक्षा की तैयारी कराते हैं, लेकिन चिंतन की गुंजाइश कम रखते हैं। भारत में कोटा जैसे कोचिंग सेंटरों की भीड़ इसका प्रमाण है। लाखों छात्र रटते हैं, लेकिन नवाचार कम होता है।
दार्शनिक रूप से देखें तो प्लेटो के गुफा सिद्धांत में कैदी छायाओं को सत्य मान लेते हैं, ठीक वैसे ही छात्र सिखाए गए ज्ञान को अंधानुकरण करते हैं।
पूर्वी दर्शन में उपनिषदों का जोर गुरु-शिष्य संवाद पर है। शंकराचार्य ने कहा, "श्रोत्रा भाव से सुनो।" लेकिन आज की शिक्षा में श्रोता भाव नहीं, बल्कि अनुपालन है। पुस्तक 'फ्रीडम टू लर्न' में तर्क दिया कि जब बच्चे स्वयं चुनते हैं, तो सीखना आनंददायक होता है। सिखाए जाने से विद्रोह जन्म लेता है। किशोरावस्था में कई छात्र ड्रॉपआउट कर जाते हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि शिक्षा बोझ है। कोविड महामारी के दौरान ऑनलाइन कक्षाओं ने समस्या उजागर की – उपस्थिति तो बढ़ी, लेकिन समझ कम हुई।
सकारात्मक पक्ष और संतुलन की आवश्यकता
फिर भी सिखाए जाने को पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता। शुरुआती शिक्षा में मार्गदर्शन जरूरी है। बच्चा अक्षर नहीं जानता, तो स्वयं नहीं सीखेगा। गुरुकुल से आधुनिक विश्वविद्यालय तक शिक्षक की भूमिका महत्वपूर्ण रही।
फिनलैंड की शिक्षा प्रणाली इसका उदाहरण है, जहां कम कक्षाएं, अधिक प्रोजेक्ट कार्य होते हैं। छात्र स्वयं खोजते हैं, शिक्षक सहायक होता है।
भारत में NEP 2020 इसी दिशा में कदम है। यह स्व-सीखने, व्यावसायिक शिक्षा और बहुभाषी दृष्टिकोण पर जोर देता है। लेकिन क्रियान्वयन चुनौतीपूर्ण है। हमें 'फ्लिप्ड क्लासरूम' मॉडल अपनाना चाहिए, जहां घर पर वीडियो देखो और कक्षा में चर्चा करो। इससे सिखाया जाना बोझ नहीं, सहयोग बनेगा।
निष्कर्ष
"मुझे सीखना अच्छा लगता है, पर सिखाए जाने से चिढ़ है" – यह कथन शिक्षा सुधार का आह्वान है।
स्व-सीखना स्वतंत्रता का प्रतीक है, जो राष्ट्र निर्माण का आधार बनेगा।
हमें प्राचीन गुरुकुल भावना को आधुनिक तकनीक से जोड़ना होगा। सरकार, शिक्षक और अभिभावक मिलकर ऐसा वातावरण बनाएं जहां जिज्ञासा पुष्पित हो। अंत में, महात्मा गांधी के शब्द स्मरणीय हैं – "सच्ची शिक्षा वह है जो चरित्र निर्माण करे और व्यक्ति को स्वावलंबी बनाए।" यदि हम सिखाने को सीखने में बदल दें, तो भारत ज्ञान का केंद्र बनेगा। स्वतंत्र चिंतन ही सच्ची प्रगति है।
#bulluias