Here Is one answer after research...
इंसानों और जानवरों के बर्थ कंट्रोल को लेकर सोच और वास्तविकता में बहुत बड़ा अंतर है।
इंसान सामाजिक प्राणी है, और उसकी इच्छाएँ और पीड़ाएँ भी अक्सर समाज से तुलना करने पर उत्पन्न होती हैं।
उदाहरण के लिए—यदि किसी महिला के बच्चे नहीं हैं तो हो सकता है कि स्वाभाविक रूप से माँ बनने की इच्छा उतनी प्रबल न हो। लेकिन जब वह अपने आसपास सभी को बच्चों के साथ देखती है, तो उसे भीतर से कमी और हीनभावना का अनुभव हो सकता है। यानी तकलीफ़ का बड़ा कारण "दूसरों से तुलना" है।
इसके विपरीत, जानवरों की मनोवृत्ति अलग होती है। उनमें ईर्ष्या जैसी भावनाएँ नहीं होतीं। वे प्रेम करना और दया दिखाना जानते हैं, लेकिन भविष्य की योजना नहीं बना सकते। इंसान सोच सकता है कि “चार दिन बाद मैं आइसक्रीम खाऊँगा और तब मुझे ख़ुशी होगी।” लेकिन कोई जानवर यह नहीं सोच सकता कि कुछ दिनों बाद उसे क्या मिलेगा।
जानवरों के लिए बच्चे पैदा करना पूरी तरह हार्मोनल प्रक्रिया है। जब उनका प्राकृतिक प्रजनन-चक्र (heat) आता है, तब उनमें मैथुन की इच्छा होती है और उसके परिणामस्वरूप संतान जन्म लेती है। यदि उनका प्रजनन-चक्र सक्रिय नहीं है, तो उनमें यह विचार या पीड़ा कभी नहीं आती कि “मेरे बच्चे क्यों नहीं हो रहे” या “मैं माँ क्यों नहीं बन पा रही।”
इसीलिए जब जानवरों का बर्थ कंट्रोल ऑपरेशन कराया जाता है, तो यह उनके लिए नपुंसकता (impotency) नहीं है। दरअसल, यह केवल उनके हार्मोन लेवल को कम कर देता है। इस कमी का असर ज़रूर पड़ता है—जैसे मोटापा (obesity) बढ़ना, और उम्र बढ़ने पर हड्डियों से जुड़ी समस्याएँ अधिक होना। लेकिन इंसानों की तरह उनमें “यौन इच्छा पूरी न होने की पीड़ा” नहीं रहती।
सच तो यह है कि प्रकृति के साथ छेड़छाड़ हमेशा किसी न किसी रूप में नुकसान ही लाती है। इसलिए जानवरों की नसबंदी को पूरी तरह सही नहीं कहा जा सकता। लेकिन सवाल यह है कि हमें यह सोच पहले करनी चाहिए थी—जब हमने कंक्रीट के जंगल खड़े किए और उनका प्राकृतिक आवास छीन लिया। जब उनके पास रहने की जगह ही नहीं बची, तो वे अपनी संतान कहाँ पलते?
इसलिए आज जब समस्या इतनी बढ़ चुकी है, तो हमें स्वीकार करना होगा कि बहुत बड़े “गलत” को सुधारने के लिए कभी-कभी एक “छोटा गलत” करना ही पड़ता है। यही कारण है कि एनिमल बर्थ कंट्रोल भले ही प्रकृति के विरुद्ध हो, लेकिन वर्तमान परिस्थितियों में यह आवश्यक समझा जाता है।
कुत्तों और गायों की परिस्थितियाँ एक-दूसरे से बिल्कुल अलग हैं।
कुत्तों के लिए प्रजनन केवल हार्मोनल प्रक्रिया है। वे न तो ईर्ष्या महसूस करते हैं, न ही सेक्स न कर पाने पर मानसिक क्लेश से गुजरते हैं। इसलिए जब उनका बर्थ कंट्रोल ऑपरेशन किया जाता है, तो वह नपुंसकता जैसी कोई पीड़ा नहीं होती, केवल हार्मोनल असंतुलन के कारण मोटापा या हड्डियों की समस्या जैसी शारीरिक दिक़्क़तें होती हैं।
लेकिन गायों की स्थिति कहीं अधिक संवेदनशील है।
प्राकृतिक गर्भाधान
प्रकृति का नियम यह है कि गाय तब ही मैथुन करती है जब वह प्रजनन-चक्र (heat) में होती है। यह पूरी तरह उसकी इच्छा और चुनाव पर आधारित है। ऐसी स्थिति में वह हर दो-तीन साल में एक बछड़े को जन्म देती है। दूध भी सीमित मात्रा में निकलता है, क्योंकि उसका शरीर उतना ही बना है। लेकिन इस प्राकृतिक प्रक्रिया में उसकी स्वतंत्रता और उसकी सहजता बनी रहती है।
कृत्रिम गर्भाधान
डेयरी उद्योग को यह स्वीकार्य नहीं है। उन्हें ज़्यादा दूध चाहिए, लगातार चाहिए। इसलिए गायों को उनकी इच्छा के विरुद्ध “कृत्रिम गर्भाधान” की प्रक्रिया में डाला जाता है। हार्मोनल इंजेक्शन देकर उनके शरीर को इस तरह से बाध्य किया जाता है कि वे बार-बार प्रजनन-चक्र में आएँ और बार-बार गर्भवती हों।
Lekin unka kya jo Gaayo ko ghar par rakhte hain??
यह स्थिति समझने के लिए सोचिए—यदि किसी स्त्री को ऐसी दवाएँ दे दी जाएँ कि उसका सामान्य मासिक चक्र (एक बार पीरियड और साल में एक बच्चा) बदलकर महीने में चार बार ओवुलेशन होने लगे। उसका शरीर लगातार गर्भ धारण करने लगे, और उसे एक “मशीन” बना दिया जाए—सिर्फ माँ बनने के लिए, सिर्फ बच्चे पैदा करने के लिए। सोचिए, उसके शरीर और मन पर कैसा बोझ पड़ेगा।
गायों की भी यही स्थिति है। उनकी प्राकृतिक गति को रोका जाता है, उनके शरीर को जबरदस्ती हार्मोनल खेल में उलझा दिया जाता है। परिणाम यह है कि दूध तो हमें अधिक मिलता है, लेकिन इसके पीछे गाय की पीड़ा छिप जाती है—वह पीड़ा जिसे वह शब्दों में कह नहीं सकती।
असल में, हमने गाय को माँ से ज़्यादा एक मशीन बना दिया है। और सवाल यह है कि अगर यही प्रक्रिया इंसानों पर थोपी जाए तो क्या हम इसे स्वीकार करेंगे?