🎯 प्रेरणाप्रद कहानियाँ
शीर्षक:- अपंग
कहानी:- बहुत पुरानी बात है, शायद उस समय की, जब हवेलियाँ रिश्तों से भरी होती थीं और आँगन में तुलसी के पौधे सजे रहते थे। भारत के एक समृद्ध नगर सिद्धपुर में सेठ धनीराम रहते थे। वे जितने धनवान थे, उतने ही भाग्यशाली माने जाते थे—सोने-चाँदी से लदी तिजोरियाँ, संगमरमर से बनी हवेली, दर्जनों नौकर-चाकर, पूरा भरा-पूरा परिवार, और व्यापार ऐसा कि दूर-दूर तक नाम था।
पर अजीब बात थी—उनके चेहरे पर वो सुकून नहीं दिखता था जो उनके धन में था। सेठजी को नींद नहीं आती थी। रात्रि उनके लिए एक सज़ा बन चुकी थी। बिस्तर पर जाते ही आँखें खुली रह जातीं, मन बेचैन हो उठता, और जब कभी नींद आती भी, तो डरावने सपनों से आंखें चौंककर खुल जातीं। कभी वे खुद को अंधे कुएँ में गिरते हुए देखते, कभी किसी सुनसान रास्ते पर अकेले डरते हुए।
उन्होंने वैद्य बुलाए, योग किया, झाड़-फूँक तक करवाई—पर कोई फ़ायदा नहीं हुआ। घर में सब थे, फिर भी वे अकेले थे। जैसे किसी अदृश्य बोझ ने उन्हें जकड़ लिया हो।
इन्हीं दिनों एक दिन नगर में खबर फैली कि एक साधु—स्वामी विशुद्धानंद—नगर के बाहर एक पुराने उपवन में ठहरे हैं। कहा जाता था कि उनके पास सिर्फ़ दवाइयाँ नहीं, बल्कि आत्मा की पीड़ा का इलाज होता है। लोग श्रद्धा से उनके पास जा रहे थे।
सेठजी भी पहुँचे—चुपचाप, विनम्र भाव से। आँखों में उम्मीद और दिल में डर लेकर उन्होंने साधु के चरणों में बैठकर कहा—
“स्वामीजी, मेरे पास सबकुछ है—पर चैन नहीं। मुझे रात को नींद नहीं आती, सपने डराते हैं, मन खाली-खाली सा रहता है। कृपा कर मुझे इस यातना से मुक्त करें।”
स्वामी जी ने कुछ क्षण उनकी आँखों में देखा। फिर गहरी, सौम्य मुस्कान के साथ बोले—
“सेठजी, तुम्हारी बीमारी बाहर की नहीं, भीतर की है। असल में तुम अपंग हो।”
सेठ चौंके। ऐसा लगा जैसे कोई तीखा तीर भीतर उतर गया हो। उन्होंने घबराकर कहा—
“महाराज! मेरे तो हाथ-पाँव सब सही हैं। फिर आप मुझे अपंग कैसे कह सकते हैं?”
स्वामीजी मुस्कराए, पर उनका स्वर गंभीर था—
“बेटा, अपंग वही नहीं होता जो शरीर से विकलांग हो। अपंग वो भी होता है जिसके पास सबकुछ होते हुए भी वह उनका उपयोग नहीं करता। सोचो, क्या तुम अपने हाथों से कुछ करते हो? क्या कभी अपने तन को श्रम में लगाया है?”
सेठजी चुप थे। क्या कहते? वर्षों से हाथ कुछ करते ही कहाँ थे? सुबह आँख खुलते ही नौकर चाय लेकर हाज़िर होता था, फिर कोई वस्त्र पहनाता, कोई नहाने का पानी भरता, कोई पंखा झलता। उनकी दुनिया में सबकुछ था, सिवाय स्वयं के श्रम के।
स्वामीजी ने प्यार से कहा—
“जब शरीर निष्क्रिय होता है, तो मन भटकता है। और जब मन भटकता है, तब चिंता, बेचैनी और डर उसके साथी बन जाते हैं। नींद तब नहीं आती जब तन थका न हो। अगर तुम सचमुच स्वस्थ होना चाहते हो तो अपने हाथों से मेहनत करो, इतना कि शरीर थक जाए। फिर देखना, मन खुद शांत हो जाएगा।”
इस बार सेठजी के भीतर कुछ टूटकर गिरा—शायद वह घमंड, जो उन्हें लगता था कि पैसे से सब ठीक किया जा सकता है।
अगले ही दिन उन्होंने अपना जीवन बदलने की ठानी। सुबह सूरज से पहले उठे, नौकरों को विश्राम दे दिया, और खुद झाड़ू उठाई। आँगन बुहारा, तुलसी को जल दिया। इतने वर्षों में पहली बार घर की धड़कनों को अपने हाथों से महसूस किया।
फिर रसोई में घुसे, खुद के लिए खाना बनाया। हाथ जले, पसीना बहा, पर मन को एक गहराई मिली। दोपहर में बाग में पौधे लगाए, पेड़ों को पानी दिया। फिर गोशाला गए, गायों को चारा दिया, उनकी पीठ पर हाथ फेरा।
संध्या होते-होते सेठजी थक गए थे, सचमुच थक गए। जब बिस्तर पर लेटे, तो कुछ सोचने की ताकत भी नहीं थी। बस आँखें बंद कीं, और पहली बार वर्षों में बिना किसी डर के नींद आ गई। गहरी, प्यारी, शांति भरी नींद।
कहानी जारी है.....