कहां कह पाते हैं पिता बच्चों से कुछ ख़ास,
मैं कहना चाहता हूं कि बेटा बहुत जियो,
मुझसे बेहतर जियो,
मेरे हिस्से का जो नहीं मिला मुझे वो भी हासिल करो,
कमाओ इज़्ज़त,
काबिलियत,
लोग,
परिवार,
दुवाएं,
और दौलत भी,
मैं तो रहता रहा छोटी सी दुनियां में,
तुम खुल के उड़ो,
मेरा विस्तार नहीं हुआ शायद,
तुम कायनात को घर बनाओ,
सब पाओ,
जानों,
हां,
प्यार तो करते हो,
मगर थोड़ी बूढ़ा हो चला हूँ तो जताओ,
बताओ कि मैं ज़रूरी हूं,
मैं जानता हूं कि तुम मानते हो,
पर मुझसे पूछो काम बेवज़ह के,
जैसे, घर की पुताई में कौन सा रंग ले लें,
या आज सब्ज़ी कौन सी बनेगी,
या दाल अरहर की बजाए चने की बन जाए तो कैसा होगा,
या किसी शादी में जाना है तो क्या पहन लिया जाए,
बस इतना ही,
क्योंकि मैं चाँद नहीं जो हर शाम आऊंगा,
मैं एक दिन अमावस में खो जाऊंगा.... !!